आज मैं आपको एक कहानी बताने जा रहा हूँ जिसे सुनकर आप भी कहेंगे वाह ! जाति हो तो ऐसी -- ये कहानी काल्पनिकता पर आधारित है । लेकिन ये बहुत प्रेरणादायी प्रसंग है। जिससे हमे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जो मैंने अपने संग्रह से लिया है।
ये मेरे
द्वारा
बनाई
गयी
एक
कहानी
है।
वैसे तो अहमद खान अच्छे गायक थे , लेकिन उन्होंने अभी तक संगीत के क्षेत्र में एक भी सीढ़ी पार नहीं की थी सायद उनके पारिवारिक समस्या के कारण ऐसा न होपाया हो कि वे एक प्रसिद्द गायक ना बन सके अहमद जनाब गायकी के साथ - साथ कवि और थोड़े - थोड़े नर्तक भी थे । वो एक काली - हरी मुस्लिम टोपी पहनते थे , बदन में एक सफ़ेद कुर्ता और थोड़ी बड़ी दाढ़ी अपने श्रृंगार में सजाते थे । उनकी आँखें मटमैली थी, जिन्हे देखते ही लगता कि वो स्वर्ग से उतरे एक फरिस्ते हैं। जहां तक फरिस्ते कि बात है वो वाकई में एक फरिस्ते जैसे ही थे। लोगो कि मदद करना उनके ज़हन में था। वो एक खुशमिज़ाज़ किस्म के व्यक्ति थे, जो लोगो में उनके विचारों के अनुसार तालमेल कायम रखता है।
यूँ तो अहमद जी का बचपन बाकि बच्चों के बचपन जैसा न बीता हो, लेकिन वो अपने बचपन के दिनों से कभी निराश न रहे, उन्होंने अपने बचपन से बहुत कुछ सीखा, जो सायद अभी तक उनके काम न आ पाया हो। अहमद खान के बचपन में ही माता-पिता के गुज़र जाने पर उनकी परवरिश उनकी बुआजान और फूफाजान ने कि। उनके फुफाजान एक मौलवी और एक अच्छे गायक थे । जिनसे अहमद ने बचपन में ही गायक बनने का निश्चय कर लिया था। उनकी बुआजान उन्हें बहुत प्यार करती थी, उन्होंने अहमद को माँ कि कमी महसूस नहीं होने दी जबकि उनके कोई बच्चे नहीं थे, तो उन्होंने अहमद को अपने बच्चे कि तरह पाला और उसे अपना वारिश बनाया। अहमद खान जब सत्रह वर्ष के थे, तो उनके ऊपर से उनके फुफाजान का साया हमेशा के लिए हैट गया। लेकिन उनकी कला अभी तक अहमद के पास बरकरार थी। अहमद हमेशा संगीतमय रहते थे। अब उनके पास उनकी बुआजान थी, जिनकी वो हमेशा देख-रेख में लगे रहते थे। कुछ सालों में अहमद का ब्याह उनके ही गांव के पड़ोस की लड़की के साथ हो गया। अहमद अब गृहस्थी के बंधन में बंध गए । विवाह के कुछ वर्षों में उनकी बुआ अपने नाती का मुँह देखकर स्वर्गवासी हो गयी। वो अब और भी दुखी हो गए। अहमद खान अब मौलवी बन चुके थे। सुबह-शाम अल्लाह-ताला के दरबार में नमाज़ पढ़ना और हमेशा खुश रहना उनके स्वभाव में था।
इस सब के बावजूद उन्होंने अपना रुतबा कायम रखा। वो संगीत का अभ्यास रोज़ करते थे और गाँव के लोग उनके इस मधुर और कर्णप्रिय वाणी को सुनने बैठ जाते थे। उनका संगीत ऐसा होता मानो आसमान से वर्षा हो रही है और जलमग्न हो रही है धरती और धरती के लोग उनके इस जल प्रलय में बह के अनंत के दर्शन कर मृत्यु को बिना प्राप्त हुए ही सीधे स्वर्ग को जा रहे हैं।
गाँव के बच्चे उनसे संगीत सीखने आते और वो उन्हें बड़े चाव से संगीत कला सिखाते थे। एक बार अहमद खान के गांव और आस-पास के गांव के लोगो ने लोगो ने एक कमेटी तैयार की, जिसमे संगीत की प्रतियोगिता होनी थी। लेकिन खान साहब इसके लिए जरा से भी उत्शुक नहीं थे। बात तो ये थी की इस प्रतियोगिता में भाग लेना तो दूर इसमें जाना भी नहीं चाहते थे । आखिर इसकी वजह प्रतियोगिता थी। अहमद खान संगीत को प्रतियोगिता नहीं मानते थे, उनके हिसाब से संगीत एक कला है जो व्यक्ति के रोम-रोम में छलकती है वो प्रतियोगिता कैसे हो सकती है तथा वो प्रतियोगिता में भाग नहीं लेना चाहते। लेकिन उनके गाँव के लोगो की ज़िद की वजह से उन्हें प्रतियोगिता में भाग लेना पड़ा।
प्रतियोगिता का दिन निकट आया, सभी संगीतज्ञों ने अपना प्रदर्शन किया। लेकिन अहमद खान की आवाज के सभी दीवाने थे अहमद खान प्रतियोगिता जीत गए और मिले इनाम के रुपये से संगीत पाठशाला की घोषणा कर दी।
बहुत
वर्ष बीत चुके थे, राज्य में एक बड़ी संगीत
प्रतियोगिता होनी थी। पत्र अहमद खान को भी आया।
पत्र के साथ एक
कागज़ था जिसमे प्रतिभागी
को अपना नाम, जाति, पता, आदि भरना था।
अहमद
इससे जरा भी खुश नहीं
थे। प्रतियोगिता के तीन दिन
पहले राज्य संगीत कमिटी को एक पत्र
मिला जिसमे लिखा था।
माननीय,
राज्य संगीत
कमिटी,
अध्यक्ष जी,
आपने इस
वर्ष
एक
संगीत
प्रतियोगिता
का
एलान
किया
है
।
आपको
इस
प्रतियोगिता
के
माधयम
से
एक
कलाकार
मिलेगा
और
ये
बहुत
सराहनीय
बात
है।
आपके
द्वारा
मुझे
भी
पत्र
भेजा
गया
था,
लेकिन
बहुत
सोच-विचार
के
बाद
मुझे
लगा
की
में
इस
प्रतियोगिता
के
लिए
ठीक
नहीं
रहूँगा
।
मैं आपको
शुभकामनाएँ
देता
हूँ
तथा
प्रतियोगिता
में
भाग
न
लेने
के
लिए
छमा
मांगता
हूँ
।
'धन्यवाद'
उस पत्र में नाम नहीं था, लेकिन वही कागज था जिसमे जाति, पता आदि भरना था। उस कागज में ऐसा कुछ नहीं भरा था लेकिन जाति भरी थी वो थी "संगीत"
ये
देखकर अधिकारी लोग भौचक्के रह गए।
मैं आशा करता हूँ की अहमद खान ( जो एक काल्पनिक कलाकार है ) से आपको बहुत कुछ सीखने को मिला होगा। हमें भी इसी प्रकार अपने रुतबे में कभी किसी मज़हब को नहीं जोड़ना चाहिए क्योकि हमारा कर्म ही हमारा धर्म निश्चित करता है।

1 टिप्पणियाँ
Bilkul shi baat
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