हमने कभी अपनी काबिलियत नहीं देखी ( ये प्रसंग आपको पढ़ना चाहिए ) - self-made 4 U




इसे लेख समझ कर अनदेखा मत कर देना और ये याद रखना की ये दुनिया इन लेखों पर टीकी है।

आज मैं आपको एक ऐसे प्रसंग से अवगत करा रहा हूँ, जो अक्सर हम सब के जीवन में होता है।  लेकिन हम उसको नहीं समझ पाते और जब समझ में आता है तो तब बहुत देर हो चुकी होती है। ये बात जो मैं आज आप सब तक पहुंचना चाहता हूँ, आप में से बहुत से लोगों के साथ हुआ होगा और बहुतों को इससे सीख भी मिली होगी।


आज का मेरा प्रसंग हम सब की काबिलियत पर आधारित है, जो सभी लोगों में अपने गुणों के अनुसार विकसित होती है। हम उस काबिलियत से जब तक परिचित नहीं होते तब तक हम हर क्षेत्र में भटकते रहते हैं, क्योकिं हमें ये ज्ञात ही नहीं है की हम उस क्षेत्र के लिए बने ही नहीं है। हम इस दौड़ में अपने वास्तविक ज्ञान को भूल जाते हैं जो हम बचपन से अपने भीतर संजोयें हुए हैं। हमें ये पता ही नहीं रहता की वास्तव में, मैं क्या सोचता हूँ और हम अपने उस दिव्य सोच को एक दिन नष्ट कर देते हैं। जिसकी हमें जीवन भर आवस्यकता थी।


निम्नलिखित कुछ बिंदु हैं जो हमें अपनी सोच की अनुभूति करातें हैं---



*अकेले में रह कर देखो-  

किसी महापुरुष ने सही कहा है की अगर तुम खुद को  जानना चाहते हो  तो खुद को अकेले में देखो की तुम क्या करते हो। क्योंकि दुनिया में लोगो के साथ जाने के बाद हम बनावटी हो जाते हैं और अपने अंतर्मन की आवाज को सुनना भूल जाते हैं। हमें अपने जीवन में बहुत से रास्तों से गुज़रना होता है और उन रास्तों में मोड़ भी होती हैं जो दूसरे रास्ते बनाती है हमें उन रास्तों में से उस रास्ते का चयन करना चाहिए जिसकी मंज़िल हमारी सोच से मिलती है। अगर हमने ये सोचकर अपना रास्ता बदल लिया की ये रास्ता छोटा है, मुझे यही जाना है मंज़िल आसानी से मिल जाएगी। हम निश्चित ही वहां पहुंच जाएंगे लेकिन हमको वहां उस सोच की अनुभूति नहीं होगी जो हमारे मन में है और उस रास्ते में है जिसको बड़ा समझ के हम छोड़ आये थे लेकिन उसकी मंज़िल हमारी सोच से मिलती है।



*अपनी सच्ची काबिलियत दिखाओ

एक बार किसी सज्जन ने मुझसे कहा था की काबिलियत का दोष नहीं होता है, बल्कि उसे देखने वाले का दोष होता है।  मतलब यह है की अगर दो व्यक्ति है और उसमे से एक को तीरंदाजी करना अच्छे से आता है और एक  कुश्ती  में निपुण है। लेकिन एक बार तीरन्दाज अपने मित्र को अपने गुरु के पास ले गया गुरु ने उनसे कहा तीरंदाजी करो लेकिन जिसको तीरंदाजी आती है उसने आसानी से तीर निशाने पर लगा दिया लेकिन दूसरा नहीं लगा पाया क्योंकि उसे तीरंदाजी नहीं कुश्ती आती थी, वो कैसे निशाना लगाता। ये देखकर गुरु ने अपने शिष्य की बढ़ाई करनी शुरू कर दी और कुश्ती वाले को कोशने लगा।
इसमें सबसे बड़ी गलती उन दोनों की है जिसने अपनी काबिलियत होते हुए भी दूसरी कला में निपुण होना चाहा और दूसरी गलती उसकी जिसने उसे उसके लिए कोसा जो उसे आता ही नहीं था। 
इसमें काबिलियत की नहीं बल्कि उन लोगो की गलती थी जिन्हे उसे देखना नहीं आता।



मैं उन लोगो से भी कहना चाहता हूँ जो अपनी काबिलियत को दुसरो के सहारे छोड़ देते हैं और उनके फैसले का इंतज़ार करते है और फैसला विपरीत आने पर भी उस पर भरोसा कर लेते है। ये ज्यादातर युवा लोगो के साथ होता है की वो अपनी काबिलियत को अपने मित्रों,  परिवारजनों और रिश्तेदारों के कहने पर दबा के रख देते है


इस दुनिया में ऐसे बहुत से लोग है जो अपनी सोच के अनुसार अपना जीवन नहीं बनाते। वो पल भर के लिए सोचते है की मुझे अपने लिए जीना है। लेकिन परिवार के लोगो, समाज के दबाव में आकर अपनी इक्षाओं का गला घोट देते हैं। उनका जीवन निरश हो जाता है।


हमारी काबिलियत एक साधन है स्वयं का अनुभव करने का, और उस अनुभव को दूसरों तक पहुंचने में तो और भी आनंद मिलता है।
मैं आपको अपना अनुभव देकर बताता हूँ। मुझे कविताये लिखने का और लेख लिखने का बहुत शोक है। जिसे आज आप देख रहे हैं की मैं उसे पूरा करने का प्रयत्न भी कर रहा हूँ। क्योंकि मैं इससे खुश हूँ और में आपको भी अपना इस लेखन का अनुभव बात रहा हूँ।


कभी भी खुद को ऐसा मत सोचने देना की तुम्हारे अंदर काबिलियत नहीं है। मैं कहता हूँ तुम्हारे अंदर इतनी  काबिलियत है की तुम उससे पूरी दुनिया को हिला सकते हो। तुम अपने क्षेत्र में कुछ ऐसा कर सकते हो जो लोगों के लिए एक मिसाल बन जाए। बस उसके लिए चाहिए जूनून, हिम्मत और आत्मविश्वास जो आपको अपने भीतर से मिलेगा। तो अपने भीतर की आवाज सुनो और कहो जोर से -

मैं कर सकता हूँ, मैं कर सकता हूँ, मैं कर सकता हूँ।

इसी आधार पर मेरी कुछ पंक्तियाँ है जो मैं आपके साथ बाटना चाहता हूँ-

बनू जरूर बनु कुछ,
इंसान जरूर बन जाऊं                                                                                      
अपने लिए तो करते सभी,
मैं इस जहाँ के लिए कुछ कर जाऊं।

लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूँ लेकिन इन लेखों को पढ़ने वाले अब हैं ही कहाँ इस ज़माने में ललित।

                                         

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