
यह कोई कहने कि बात नहीं है कि हमारा राष्ट्र भारत अंग्रेजों का गुलाम कैसे बना या अंग्रेजों ने भारत को अपना उपनिवेश बनाया । शायद यह भी हो सकता है कि भारतीय चतुर स्वभाव के न होकर सरल स्वभाव के हों या दूसरों पर आँख मूंदकर भरोसा करते हों । बहुत लोग यह भी मानते है की भारतीय रूढ़िवादी , अंधविश्वासी थे । लेकिन मेरे ख़याल से इन शब्दों का यहाँ प्रयोग करना उचित नहीं है । मैं जहां तक मानता हु ये उनकी मानसिकता तथा गुलाम बनने की एक प्रवृती थी ।
नहीं
तो ' एक मुट्ठी भर
व्यापारी आके कैसे दुसरे देश पर अपना आधिपत्य
जमा सकते थे । भारत
में वीर राजाओं तथा सम्राटों का शासन था
जो अंग्रेजों को आसानी से
भगा सकते थे , लेकिन वो इनके गुलाम
क्यों बने ? क्या वे कायर थे
या मूर्ख थे जो उनकी
चाल का शिकार बन
गए ।
इसमें
कोई संदेह नहीं है की भारत
आज एक शक्तिशाली देशों
की गिनती में आता है और अपने
मित्र राष्ट्रों की सहायता करने
में भी सक्षम है
और अपना स्थान प्रथम श्रेणी में बनाये हुए है यह सही
भी है कि देश
आगे की और बढ़
रहा है तथा आने
वाले समय में विकसित देशों की श्रेणी में
भी आ जाएगा लेकिन
क्या हम अपनी इस
प्राचीन संस्कृति को ज्यों की
त्यों उचित रूप से बनाये हुए
है ? क्या हमारी संस्कृति अब धीरे - धीरे
समाप्त हो रही है
? क्या लोग पश्चिमी सभ्यता का प्रचार - प्रसार
कर रहे है ?
इसमें
कोई आशंका की बात नहीं
है कि यदि मैं अभी इन प्रश्नों को
अभी इंटरनेट में डालूं तो लोग मेरी
बातों को समर्थन देंगे
, चाहे वो मेरी बातों
से समर्थ हों या ना लेकिन उनमे से कई देश
के विरासती संस्कृति के पक्ष में
नहीं हैं ।
हम
अपनी मात्रा भाषा हिंदी को तो मानते
हैं परन्तु हिंदी को सम्मान नहीं
देते । हिंदी लोगों
को बोझ लगने लगी है लोगों को
हिंदी की समझ ही
नहीं है । भारत
के सभी लोग कहते हैं भारत मेरा देश है ! लेकिन भारत तो तब ही
रहेगा जब भारत की
संस्कृति रहेगी हिन्दुस्तान की बात सभी
कहते है परन्तु इस
बात की मर्यादा नहीं
रखते है ।
लिखने
वाले लेख , कवितायें और कहानियां तो
लिखेंगे ही परन्तु कुछ
समय बाद वो ही अंगरेजी
के शब्द बोल कर हिंदी को
ठेंगा दिखा देते है । लोगों
को अपनी संस्कृति का कोई आत्म
सम्मान करना ही मजाक लगता
है वे उस संस्कृति
को जानते हुए उसकी सभ्यता नहीं बनाते है मेरे अनुसार
संस्कृति ज्यों की त्यों नहीं
है ।
जो नवीन भावी पीढ़ी का जन्म हुआ है वो अंग्रेजी के दौर से गुजर रही है निजी विद्यालयों मैं अंग्रेजी को अधिक महत्त्व तथा हिंदी को काम महत्त्व दिया जा रहा है यहाँ तक की कई विद्यालयों में हिंदी का सिर्फ एक ही विषय है तथा बच्चे उससे भी नफरत करते हैं हमारी पुराने पीढ़ी के बुजुर्ग लोग भी इस अंग्रेजी युग का साथ दे रही है ये नहीं है की हम हिंदी नही बोलते , बोलते है । लेकिन उसका बोलना भी कुछ लोगो को खटकता है तथा उसका आदर नहीं करते । यदि हिंदी की ही ऐसी हालत है तो संस्कृत तो अंतिम चरण पर ही होगी जिसे देव भाषा कहते है लेकिन देव भाषा माना नहीं जाता क्योंकि अब अंग्रेजी ही लोगों के लिए प्रमुख हो चुकी है ।
जो नवीन भावी पीढ़ी का जन्म हुआ है वो अंग्रेजी के दौर से गुजर रही है निजी विद्यालयों मैं अंग्रेजी को अधिक महत्त्व तथा हिंदी को काम महत्त्व दिया जा रहा है यहाँ तक की कई विद्यालयों में हिंदी का सिर्फ एक ही विषय है तथा बच्चे उससे भी नफरत करते हैं हमारी पुराने पीढ़ी के बुजुर्ग लोग भी इस अंग्रेजी युग का साथ दे रही है ये नहीं है की हम हिंदी नही बोलते , बोलते है । लेकिन उसका बोलना भी कुछ लोगो को खटकता है तथा उसका आदर नहीं करते । यदि हिंदी की ही ऐसी हालत है तो संस्कृत तो अंतिम चरण पर ही होगी जिसे देव भाषा कहते है लेकिन देव भाषा माना नहीं जाता क्योंकि अब अंग्रेजी ही लोगों के लिए प्रमुख हो चुकी है ।
अगर
ऐसा ही चलता रहा
तो केवल हिंदी का इतिहास ही
सुनने को मिलेगा , हमें
इसको भविष्य बनाना है ।
में
तो उन लोगों को
पढ़ा - लिखा मानता हूँ जो हिंदी बोलते
है क्योंकि कोई नई संस्कृति को
अपनाना पढ़े - लिखे की निशानी नहीं
है बल्कि जो अपनी संस्कृति
को बचाये रखे वो ही पढ़ा
- लिखा है ।
और
अंत में मैं ललित मोहन बिष्ट ये ही कहूंगा
की हिंदी अंग्रेजी भाषा ही है इसमें
टकराव नहीं परन्तु हिंदी हमारे राष्ट्र व् संस्कृति का
प्रतीक है जिसे हमें
बरकरार रखना है तो क्यों
ना हम हिंदी के
युग में चलें , हिंदी
को ग्रहण करें , हिंदी का प्रचार - प्रसार
करें व संस्कृति के
महत्त्व को बनाये रखें
।
मेरा एक गीत है जो मैंने हमारी हिंदी भाषा की
तरफ से भारतीयों के लिए लिखा है -
हिंदी हूँ मैं हिंदुस्तान मेरा देश है ,
जीने दो मुझे भारत मेरा वेश है ।
संस्कृति हूँ मैं तुम्हारी , भूलो ना कभी मुझे ।
गुनगुनाते रहो मुझको , गीत हूँ मैं तुम्हारी ।।
मस्तक है भारत मेरा , कहता तू मेरे केश है ।
मैं सयानी नहीं हूँ , कि तुम मुझे विदा कर दो ।।
जी रही हूँ अपना बचपन , ये मेरी जन्मभू मी स्वदेश है ।
बनके रहना चाहती हूँ इस देश की में , एक छोटी बच्ची की तरह ।।
गाते रहो तुम मुझे मत भूलो ।
भूलोगे तो तुम्हारा भूलना मेरा प्रदेश है ।।
मेरा एक गीत है जो मैंने हमारी हिंदी भाषा की
तरफ से भारतीयों के लिए लिखा है -
हिंदी हूँ मैं हिंदुस्तान मेरा देश है ,
जीने दो मुझे भारत मेरा वेश है ।
संस्कृति हूँ मैं तुम्हारी , भूलो ना कभी मुझे ।
गुनगुनाते रहो मुझको , गीत हूँ मैं तुम्हारी ।।
मस्तक है भारत मेरा , कहता तू मेरे केश है ।
मैं सयानी नहीं हूँ , कि तुम मुझे विदा कर दो ।।
जी रही हूँ अपना बचपन , ये मेरी जन्मभू मी स्वदेश है ।
बनके रहना चाहती हूँ इस देश की में , एक छोटी बच्ची की तरह ।।
गाते रहो तुम मुझे मत भूलो ।
भूलोगे तो तुम्हारा भूलना मेरा प्रदेश है ।।

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