नमस्कार मित्रों मैं आज आपको जिस प्रसंग से अवगत कराने जा रहा हूँ, वो मैं अपनी एक नाटक के आधार पर बताऊंगा जो मैंने अपने प्रसंग से लिया है। ये कहानी मुख्यतः पिता और पुत्र की है। ये नाटक काल्पनिकता पर आधारित है लेकिन इसकी घटनाएं वास्तव में होती है।
दृश्य-१
मैं इस नाटक की सुरुवात करता हूँ एक छोटे से शहर से। उस शहर में एक व्यापारी रहते हैं, जिनका नाम शिवप्रसाद है। आज उनके घर में खुसी का माहौल है, क्योकिं उनके घर में आज एक नए सदस्य का आगमन होने
वाला है जो उनकी सारी खुशियों का हक़दार होने वाला है, वो है उनकी पहली संतान
उनका पुत्र जो अभी कुछ देर पहले हुआ है। इसका सन्देश उन्हें अभी हुआ है, और वो अपने ग्राहकों को छोड़कर भागे-भागे जा रहे है अपने राजकुमार से मिलने।
शम्भू- अरे! शिवप्रसाद जी कहा जा रहे हैं दौड़े-दौड़े।
लेकिन शिवप्रसाद जी अभी सुनने वाले नहीं है उन्हें तो उस छोटे से फूल की महक आ रही है और वो जा रहे है बस उससे मिलने।
श्यामा- अरे शम्भू भैया, आज न रुकेंगे वो। तुम्हे पता नहीं आज शिव भैया का लड़का हुआ है भगवान् की कृपा से।
शम्भू- अच्छा, मेरी घरवाली ने तो ऐसा कुछ बताया ही नहीं।
श्यामा- अरे ! भैया उनकी तो वही जाने हम चले देखने।
शम्भू- हां, चलो भाई चलो।
शिवप्रसाद अब अपने घर पहुंच गए है अपने बेटे से मिलने। दौड़े-दौड़े जाते हैं अपने बेटे के पास।
रूपा- अरे! शिव भैया कहा भागे जाते हो। तनिक आराम से जाओ तुम्हारा ही लड़का है कहि भगा थोड़ी जाता है।
शिवप्रसाद- हां बहिन आराम से ही तो जा रहा हूँ।
अब शिवप्रसाद कमरे में पहुंच गए है, उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं है। उन्होंने अपने चाँद के टुकड़े को पलंग से उठाया और उससे बातें करने लगे आज तो जैसे उनके लिए ये आखिरी दिन हो गया हो और वो अपनी सारी इक्षाएं आज ही पूरी करना चाह रहे हो। अपने पुत्र को अपनी बाँहों में भरते ही जैसे उनकी सारी थकान मिट गयी हो और उनके मुख में एक नए तेज़ का आगमन हो गया हो।
आज उनसे ज्यादा बलवान और धनवान उनके आलावा और कोई भी नहीं है इस दुनिया में। वो अपनी सीपनुमा बाँहों में अपने अनमोल मोती को थामे हुए हैं। वो अपने पुत्र के प्रेम में सब कुछ भुला देना चाहतें हैं। वो अपनी सारी संपत्ति उस पर न्योछावर कर देना चाहतें है, वो सारे सुख उसे देना चाहते हैं।
इतने में चंदा बोलती है जो शिवशम्भु की धर्मपत्नी है- अरे! जी आज ही इससे सारी बातें कर लेंगे या उसे सोने भी देंगे।
शिवशम्भु- अरे! हाँ चंदा तुम चुप रहो तुम तो उस समय से इसे अपने साथ सुलाए हुए हो। अरे! देखो इसकी आँखें मेरी जैसी हैं और नाक तुम्हारे जैसा लगता है।
चंदा- माँजी तो कह रही थी लल्ला की आँखें
बहु जैसी हैं।
शिवप्रसाद- माँ तो वैसे ही कह रही होगी तुम्हारा मन बहलाने के लिए इसकी ऑंखें मेरी जैसी हैं, हाँ बस।
चंदा- अरे! हाँ तुम्हारे जैसी हैं चलो अब उसे सोने तो दो और तुम आने वाले मेहमानो का स्वागत करो।
शिवप्रसाद- अरे! हाँ ये तो मैं भूल ही गया था, जाता हूँ।
शिवप्रसाद जी ने मेहमानो को विदा किया और अब बेटे के नामकरण की तैयारी करने लगे।
नामकरण के दिन उन्होंने पुरे शहर को आमंत्रित किया था।
बेटे का नाम कार्तिक रखा गया। सभी आये मेहमान और सम्बन्धियों को धन्यवाद देते हुए उन्हें विदा किया।
दृश्य- २
कार्तिक अब डेढ़ वर्ष का हो गया था। शिवप्रसाद उससे बहुत प्यार करते थे उसके लिए वो दुकान से जल्दी घर आ जाते थे। कार्तिक खिलौनों से रोज़ खेलता था अभी वो अपने खिलौनों से खेल रहा है। आज शिवप्रसाद दुकान में नहीं गए हैं और अपनी पत्नी रूपा और अपनी माँ मणि देवी के साथ उसके खेल को देख रहे हैं। उसके साथ खेलते भी है लेकिन उसे खुश करने के लिए उसे जीता देते हैं और कार्तिक जोर-जोर से हसता हुआ उनकी गोद में आकर बैठ जाता और उनकी मूछों पर ताव देने लगता है। शिवप्रसाद उसे अपनी दाढ़ी चुभाने लगते हैं। कार्तिक उनकी गोद से उतर कर रुख जाता है। शिवप्रसाद उसे फिर से मानाने लगते हैं और वो फिर से खेलने लगता है।
चंदा- अरे जी मैं क्या कहती हु इसे स्कूल भेज देते हैं अगले वर्ष से।
मणि देवी- अरे हाँ शिव बहु ठीक कहती है अगले वर्ष से ये ढाई वर्ष का हो जाएगा और पाठशाला जाने लायक हो जाएगा।
शिवप्रसाद- हाँ माँ तुम ठीक कहती हो इसे अगले वर्ष से पढ़ने के लिए भेज देंगे।
मणि देवी- हाँ इसे थोड़ा बहुत ऐबीसीडी, अआकख सीखा दूंगी।
चंदा- है माँ अभी से सीखेगा तभी तो आगे भी क्र पाएगा।
शिवप्रसाद- अभी तो छोटा है उसे थोड़ा खेलने दो फिर पढ़ना होता रहेगा।
शिवप्रसाद फिर से कार्तिक के साथ खेलने लगते हैं।
दृश्य- ३
कार्तिक अब स्कूल जाने लगा था उसके नए - नए दोस्त भी बन गए थे , उसका ज्यादा वक़्त स्कूल में ही बीतता था अब उसका ज्यादातर समय उसके दोस्तों के साथ बीतने लगा था , अपने पिताजी के साथ समय बिताना वो भूल सा गया था । शिवप्रसाद और कार्तिक के बीच में ये दूरी बढ़ती ही जा रही थी । जो कार्तिक बचपन में अपने सारे दुःख दर्द अपने पिता से बांटा करता था वह अब उसका सम्बन्ध अपने पिता से इतना नहीं रहा ।
शिवप्रसाद अभी भी उससे उतना ही प्रेम करते है वह अभी भी अपनी सारी खुशियां उस पर लुटा देना चाहते है , उन्हें थोड़ा दुःख तो होता की कार्तिक बदल गया है लेकिन वे उसे अनदेखा कर के ये सोचते की लड़का बड़ा हो रहा है ।
कार्तिक अपनी बातें अपने पिता से साझा नहीं करता था कभी - कभी तो शिवप्रसाद ये सोचते की जिसके लिए में सब कुछ न्योछावर करना चाहता हूँ वो मुझसे अपनी बातें नहीं बताता वो अब बदल गया है ये सोच कर उनकी आँखों में आंसू आ जाते है और वे अपने आंसूं पोछ कर फिर से उम्मीद की नयी किरण जगा बैठते है ।
कार्तिक अब पढ़ाई के लिए विदेश जाने लगा , शिवप्रसाद को खुशी भी थी और ये दुःख भी था की वो उससे दूर जा रहा है वे उसे रोकने की चैष्ठा भी करते तो कैसे ?
जिस कार्तिक को बुढ़ापे में अपने माता - पिता की सेवा करनी चाहिए थी और उनके साथ रहना चाहिए था वो उनसे दूर जा रहा है । शिवप्रसाद और चंदा की आँखों में आंसू थे की जिस छोटे से फूल को वो अपने बगीचे में सजाये हुए थे हवा उस फूल को बगीचे से तोड़ कर अन्यत्र ले लई। अब तो उन्हें वह हवा भी चुभने लगी थी जिसने उनके फूल को उनसे अलग कर दिया उनका जीवन निरश सा हो गया था ।
दोस्तों जिस शिवप्रसाद ने अपने बेटे के लिए अपने भीतर सपने सजोये थे और उसकी कि माँ चन्दा ने उसे अपने आँचल में छुपाये रखा था वह उनसे दूर चला गया शिवप्रसाद की सीपनुमा बाहों में जो मोती छुपा करता था, वो समुद्र की गहराई में कहीं खो गया । वो बेचारा बूढ़ा उसे ढूंढे तो कहा ढूंढे ।
जो माता - पिता अपने बच्चों को जी भर के प्रेम करते है और उनसे उसी प्रेम की आशा करते है । अगर उन्हें वो प्रेम अपने बच्चों से नहीं मिलता तो उन बच्चों पर धिक्कार है । जो माँ अपने बच्चे को नौ महीने कोख में संभाले रह कर इतने कष्ट सहती है और पिता जो उम्र भर उसके लिए कड़ी मेहनत करता है वो बच्चा उन्हें छोड़ कर अपने निजी सुख के लिए चला जाता है तो उन माता - पिता को बहुत दुःख सहना पड़ता है।
दोस्तों में आपसे अनुरोध करता हूँ की आप अपने माता-पिता को हमेशा खुश रखिये।



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