पर्यावरण शब्द दो शब्दों के मेल से बना है - परि + आवरण । अर्थात परि का अर्थ है हमारे चारों ओर तथा आवरण का आशय है परिवेश। अगर हम सरल शब्दों में कहे तो जो भी हमारे आस-पास है, वो हमारा पर्यावरण है।
सामान्यतः पर्यावरण उसमे रहने वाले प्राणियों, वनस्पतियों, मानव जाती तथा अन्य थलजीवी, नभजीवी तथा जलजीवियों का एक अनुपम समावेश होता है। हम इसको जैसा चाहे अपनी इक्षानुसार बदल सकते हैं।
लेकिन इसके बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे। अभी हम पर्यावरण के विषयानुसार सुंदर चित्रण प्रस्तुत करते हैं। ये चित्रण मैंने अपने संग्रह से लिया है।
जब मैं सुबह को उठा तो मैं अपने घर के पीछे के आँगन में गया। मैंने इधर से एक मनोहारी दृश्य देख। खेत, पेड़-पौधे हरे रंग से भरे हुए थे।
मानों प्रकृति साड़ी रात्रि निद्रा लेने पश्चात स्नान करके, नए वस्त्र धारण किये हुए मुझ वर को अपनी और इस प्रकार आकर्षित कर रही है , की वो मेरी प्रिय हो और मेरा उससे बिवाह होने वाला है। फूल मेरे विवाह में बाराती हैं , जो रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर बरात की शोभा को चमक प्रदान कर रहे थे।
ठंडी वायु मेरे ह्रदय को इस प्रकार भेद कर मुझे परमात्मा के अनूठे रूप का दर्शन करा रही है कि वो प्रकृति की महक है। पक्षियों की चहचहाहट एक नवीन वाद्य यन्त्र की भांति मेरे विवाह में फ़ो मुझमे तथा दूसरों में आलस उमड़ा है उसे छोड़ परिश्रम और मधुर रास वाले गीतों को गाने के लिए प्रेरित कर है।
लेकिन ये मेरी कल्पना हमेशा ऐसी ही रहेगी या कभी ये अपने वास्तविक रूप में आएगी।
आज विज्ञान के असीमित प्रयोग और अपनी इक्षाओं की पूर्ति के लिए मानव जो पर्यावरण को असहनीय छति पंहुचा रहा है ये बहुत चिंता का विषय है। जो हम पर्यावरण संतुलन की बात करते हैं विज्ञान की उपलब्धियों को देखकर मानव इस संतुलन की उपेक्षा कर रहा है।
शहरीकरण , औद्योगीकरण के विकास के साथ-साथ जनसंख्या में अनियमित वृद्धि ये आने वाले संकट का साफ-सुथरा संकेत है।
इसको देखते हुए मानव जाति
का विनास निकट आ रहा है , मानव सभ्यता का अंत पृथ्वी के दूषित होने के कारण
निश्चित होने में कोई अधिक समय शेष नहीं है।
1992 में ब्राज़ील में इस बात को ध्यान में रखकर 174 देशो के मध्य वार्ता हुई जो सराहनीय थी। लेकिन इस वार्ता का कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। इसके पश्चात सं 2002 में जोहान्सबर्ग में पृथ्वी सम्मलेन आयोजित किया गया तथा विश्व के सभी देशों को पर्यावरण के बारे में बताया गया और इसकी रक्षा के लिए आगे आने को कहा गया। अगर पृथ्वी की हम मानवों ने मिलकर रक्षा नहीं की तो पृथ्वी का विनाश होने से कोई नहीं रोक सकता। हमने निश्चित ही अपने पर्यावरण को प्रदूषित किया है , लेकिन इसको स्वच्छ बनाना भी हमारा ही कर्त्तव्य बनता है।
पर्यावरण प्रदूषण के कारण-
पर्यावरण को दूषित करने वाले कारण निम्न है-
१- जल प्रदूषण- यदि हमें पर्यावरण को बचाना है तो हमें जल पर अधिक ध्यान देने की आवस्यकता है। ये जल ही है , जो सम्पूर्ण प्राणी मात्र की एक आवस्यकता है। आज औद्योगीकरण के इस युग में मनुष्य अंधा हो गया है। अपनी दैनिक जीवन की आवस्यकता को भी प्रदूषित करने से नहीं चूक रहा है। हम जल को प्रदूषित तो कर ही रहे हैं। हम इसको अनावस्यक व्यर्थ भी कर रहे हैं। इसका अच्छा खासा उदाहरण हमारे घरों में दिख जाता है , कि जो हम '
जल ही जीवन है ' का नारा लगाते हैं , हम उसका कितना अनुशरण करते हैं।
जल को
प्रदूषित करना सुबह से ही प्रारम्भ कर देते हैं और लगातार इसे दूषित करते रहतें हैं। घरों का गन्दा जल जब नदियों के जल से मिलता है , तो इससे जल में रहने वाले जीवों को ही हम हानि नहीं पहुंचाते वरन हम स्वयं को भी इतना ही हानि पहुंचाते हैं।
हमारी पृथ्वी में पीने योग्य जल 2.5% है , जो 7 अरब लोगों के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि हम इस जल को भी दूषित कर दे , तो हमारा इस पृथ्वी में रहना व्यर्थ ही है। फैक्ट्रीयों का गन्दा अपशिस्ट जब नदियों में जाता है , तो नदी में विभिन्न प्रकार के रसायन घुल जातें हैं। जो उन लोगो को मृत्यु तक प्राप्त कराने के लिए पर्याप्त हैं , जो लोग उसका उपयोग करते हैं।
नदियों तालाबों में जानवरों को नहलाना , कपडे धोना , अपने घर का अपशिस्ट जल उसमे प्रवाहित करना सभी इस प्रदूषण के कारण हैं। बहुत से लोग धार्मिक मान्यताओं में आकर नदियों में अस्थि-विसर्जन करते हैं। लेकिन जल प्रदूषित होने का कोई ध्यान ही नहीं है। अपने पूर्वजों को खुश करने के लिए अपने आने वाली पीढ़ी का गला घोट देते हैं। प्राकृतिक वस्तुओं के छेड़-छाड़ को और भी बढ़ावा तब मिलता है जब लोग मानसरोवर जैसी झीलों को भी दूषित कर देते है। ये सभी कारण हमें गहराई से सोचने पर व्याकुल कर देते हैं , की मानव इतना मुर्ख हो सकता है। जो स्वयं का विनाश देखने के लिए इतनी कस्मकस में लगा है।
वायु प्रदूषण-
वायु ही मात्र वो साधन है जो हमें निरंतर प्रतिपल चाहिए होती है। जिसके बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते। अब प्रश्न ये आता है की जो प्राणवायु (oxygen)
हमें जीवन देती है अगर वो हमें मिले ही न तो क्या होगा ? अगर इस प्राणवायु को हम विनाशवायु बना दे तब क्या होगा ? इसका सामान्य सा उत्तर है , की हम जीवित नहीं रहेंगे। तो इस उत्तर से एक और प्रश्न उठता है , की यदि हम जीवित नहीं रहेंगे तो हम वायु को प्रदूषित क्यों कर रहे हैं ? शायद इस प्रश्न का उत्तर किसी के पास नहीं होगा। मेरे पास भी नहीं है।
हम सभी जानते हैं की हमारी पृथ्वी में प्राणवायु की मात्रा 21% है जो निरंतर घटती जा रही है। जिसके मुख्य कारण हम मनुष्य हैं। कारखानों से निकलने वाला गन्दा धुआं , वाहनों से निकलने वाली कार्बन-मोनोऑक्साइड हमारी दैनिक दिनचर्या को तो ख़राब कर ही रही है वरन हमें अस्वस्थ भी कर रही है। मनुष्य की औसतन आयु निरंतर घटती जा रही है। जो हमारे भविष्य का सही संकेत नहीं है। महानगरों में ये हालात और भी परेशान करने वाले हैं , वहां का आसमान काली चादर से ढका रहता है।
आज जब हम दूसरे प्राणियों की रक्षा तथा संरक्षण की बात करते हैं तो हमारा सर शर्म से नीचे झुक जाना चाहिए। हमने स्वयं का और दूसरे प्राणियों का जीवन संकट में डाल दिया और अभी भी हम पर्यावरण संरक्षण के नारे लगाते नहीं थकते।
ध्वनि प्रदूषण , भूमि प्रदूषण
ये सभी हमारे पर्यावरण
को हमारे माध्यम से नुकशान पंहुचा हैं और हम इसके मुख्य कारक है।
जिनको हमने नियंत्रित नहीं किया तो हमारा विनाश निश्चित है।
पर्यावरण संरक्षण के उपाय- जैसी हम सब की कल्पना है , की हमारा पर्यावरण
सुरक्षित हो। हमे वैसे ही उपायों की आवस्यकता है। जो उपयोगी होने के साथ-साथ किसी भी प्राणीमात्र को लेस मात्र भी हानि न पहुचाएं। ऐसे ही कुछ उपाय निम्न हैं-
-- वृक्ष लगाना पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे कारगर उपाय है । हम किसी भी मांगलिक कार्य में अपने घर के बगीचे या अन्यत्र वृक्ष लगा सकते हैं।
अभी ऐसी बहुत से जानकारियां सामने आयी हैं की शादी के दिन पति-पत्नी ने पेड़ लगे। ये पर्यावरण को जागरूक करने के लिए बहुत अच्छी पहल है।
-- हम पर्यावरण प्रदूषण के कारणों को नष्ट करके भी उपाय बना सकते हैं। हम कारखानों को ऐसे स्थान पर स्थापित करे की उनसे जलीय जीव को कोई आपत्ति न हो।
-- हमारे समाज में गरीब लोग हैं जो प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित हैं। बल्कि समस्त जीव प्रकृति पर आधारित है। हम प्रकृति को पहले जैसा तो नहीं बना सकते लेकिन हम प्रदूषण उत्पन्न करने वाले संसाधनों का उपयोग करना
कम कर सकते हैं।
-- हम प्लास्टिक का उपयोग कम से कम करे और पर्यावरण संरक्षण में योगदन दें।
-- जल को कम से कम उपयोग में लाये और कितनी आवश्यकता हो उतना ही प्रयोग करें। व्यर्थ जल को नहीं बहाना चाहिए। कही भी किसे भी जगह जल का अनावस्यक प्रयोग हो तो हमे जागरूक करने का प्रयत्न करना चाहिए।
-- हम धूम्रपान न करके भी पर्यावरण को और स्वयं को विनाश से बचा सकते हैं।
-- प्रदूषण रहित वाहनों का प्रयोग करना चाहिए। कम से कम वाहनों का उपयोग करें।
ये उपाय हमें अपने पर्यावरण को संरेखित करने के लिए पर्याप्त नहीं
हैं । हमें इनका अनुशरण भी करना होगा ताकि हम अपने प्राणो की रक्षा कर सके। हमारी वो शिक्षा किसी काम की नहीं जिससे हम अपने पर्यावरण और स्वयं को न बचा पाए। हम जो विभिन्न कार्यक्रमों के तहत पर्यावरण को संरक्षित करने का प्रयत्न करते है हमें उनके अनुशार कार्य भी करना चाहिए। हमें सरकार के साथ मिलकर विभिन्न कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए। ये पर्यावरण हम सब का है हमें इस की रक्षा का संकल्प लेना आवश्यक है।







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