
आज फिर से कुछ लिखने का मन हुआ है। कुछ दिनों से नहीं लिख रहा था अंदर से एक आवाज सी आ रही थी- ललित कुछ लिख। मैंने भी लिखना उचित समझा तो बैठ गया लिखने। आज कुछ अलग लिखने का मन है कुछ अनोखा। अभी मैं अपने विषय से थोड़ा भटक रहा हूँ। लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। मैं कुछ लिखने जा रहा हूँ।
जब छोटा था बहुत सी उलझने रहती थी मन में। मेरे क्या जब आप भी छोटे थे तो आपके मन में भी कुछ विचार आते होंगे। बस कुछ ऐसा ही मेरा भी था। मैं नहीं जानता आपका बचपन केसा बीता होगा या बीत रहा है। लेकिन मेरा बचपन मुझे पता है। आज जब मैं इस लेख को लिख रहा हूँ, मैं सत्रह वर्ष का हूँ और अभी मैं बड़ा हूँ, हाँ इतना बड़ा नहीं लेकिन सत्रह का तो हूँ ही। मेरे अनुसार बचपन ग्यारह-बारह वर्ष तक ही रहता है। मेरा भी ऐसा ही रहा है, लेकिन न मेरा आपके जैसा न आपका मेरे जैसा। सबका बचपन और उसकी यादें अलग सी होती है। उन यादों में उनका एक परिवार होता है जो उनसे प्यार करता है। मेरे बचपन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है थोड़ी अलग।
उस समय मेरे माता - पिता कितने खुश हुए होंगे जब मैं हुआ था। कारण ये था की मैं माता - पिता के ब्याह के दस वर्ष बाद हुआ था। तभी मैं अनुमान लगा सकता हूँ की वो खुश होंगे। मेरा जन्म उत्तराखंड के एक खूबसूरत घाटी वाले जिले में हुआ था जिसका नाम है चम्पावत। मैं चम्पावत के लोहाघाट में हुआ था जो जिले का एक शहर है। मैं चाहे हुआ लोहाघाट में हूँ लेकिन मेरा विशेष लगाव अपने
गाँव गरसाड़ी से ही रहा क्योकि मेने अपने बचपन के ढाई वर्ष वहीँ बिताएं है। वो भी अकेले नहीं अपने दाजू
(बड़ा भाई) के साथ। दाजू मेरे बड़े चाचा का बड़ा पुत्र है, कहानी मुख्यतः मेरी और उसकी है। दाजू मुझसे पांच महीने बड़ा है। घर के लोग कहते हैं जब हम छोटे थे तो दाजू थोड़ा शैतान हुआ करता था, लेकिन मैं सीधा था। दाजू चाहे कितनी भी शैतानी क्यों न करता हो लेकिन वो मेरा बहुत ख्याल रखता था और अभी भी मुझसे उतना ही प्यार करता है जितना बचपन में करता था।
हम दोनों की कहानी सुनते- सुनते आपको दिन से रात हो जाएगी लेकिन ये कहानी कभी ख़त्म नहीं होगी और मैं कभी इसको कभी ख़त्म नहीं करना चाहूंगा। मैं तो ये चाहता हूँ दाजू और मेरी कहानी हमेशा ऐसी चलते रहे, जिसका कभी अंत न हो।
पहला कारनामा- हम दोनों के कारनामे तो वैसे बहुत है लेकिन जो सबसे प्रसिद्ध कारनामा है वो मैं पहले बताना चाहुँगा। तो कारनामा ये है की हम दोनों आमा (दादी) के बक्से से मिठाई चुराते थे, हम दोनों जब भी साथ रहे हम ने ऐसे काम किये जरूर। अभी चाहे हमारी बढती उम्र उस में बाधा बन जाती हो, लेकिन हम अभी भी इस प्रकार के काम करते रहते हैं।
हाँ तो बात थी आमा के बक्से दाजू और मेरी। हम तीनो में ऐसी मित्रता हो गयी थी हम हर दिन एक दूसरे से मिल ही जाते जिस दिन दाजू और मैं बक्से से नहीं मिल पाते, उस दिन थोड़ा बुरा लगता, लेकिन मुलाकात जल्दी हो जाती थी। हमारे पहाड़ के घर में एक भाड़
(सबसे ऊपरी मंज़िल) था जहा आमा का बक्सा रहता था। उस बक्से की कहानी ये है की पिताजी उसे लेके आये थे। लेकिन बक्से का दुर्भाग्य ऐसा की उसकि एक तरफ की कुण्डी टूट गयी। लेकिन ये दुर्भाग्य ने ही दाजू और मुझे उसका मित्र बनाया। आमा के बक्से में हमेसा मिठाई रखी रहती थी, यदि नहीं भी हो तो उसमे काजू, बादाम, किसमिस तो होना अनिवार्य था। हम मिठाई के लालच में बक्से तक जाते लेकिन फिर वापस आ जाते। लेकिन एक दिन हम दोनों नो अपने घुटनों का जोर लगा दिया मिठाई चुराने के लिए। मैने कुण्डी टूटे हुए तरफ से बक्से का फाटक उठाया और दाजू अपना हाथ बक्से के अंदर डाला। उसके छोटे से हाथों में जितने भी टुकड़े मिठाई के लगे उससे हमारा एक दिन का कोटा पूरा हो गया। हम अब रोज़ - रोज़ ऐसा करने लगे थे। मन में कभी ये विचार नहीं आता की हम कुछ गलत् तो नहीं कर रहे विचार आये कहाँ से हमें मिठाई जो खानी थी। घर वालों को पता था हमारी चोरी के बारे में लेकिन कोई कुछ नहीं कहता।
एक बार की बात है, हम उन दिनों गरसाड़ी में नहीं रहते थे। लेकिन हमारी आदत वही रहती थी पहाड़ गए हुए थे अपने काम को अंजाम देने हम भाड़ में गए और मेने बक्से का फाटक ऊपर उठाया, दाजू ने हाथ अंदर डाला और इस बार रसगुल्ला निकला। मुँह में पानी आ गया हम भाइयों के। उस समय तो हमें ऐसा लगा सारे ब्रह्माण्ड की खुशियां हमारे पास हैं, हमारा मनोरथ सिद्ध हो गया उतने वर्षो की तपस्या रसगुल्ला खाने की आज पूरी हो गयी। इतने में ऐसा लगा कोई हमारा रसगुल्ला छीनने आ रहा है। मेरे कानों में दाजू की आवाज पड़ी, शिवम् (मेरे घर का नाम) चाचा आ गए। हड़बड़ी में उसने वो रसगुल्ला अलमारी के कोने में डाल दिया। चाचा आये छोटे वाले, क्या कर रहे हो नानू - शिवम्। कुछ नहीं छुपने वाला खेल रहे थे ‘ मैं बोला ‘ । अच्छा चलो नीचे चलो । वो हमे अपने साथ नीचे ले गए। थोड़ी देर बाद हम मौका मार के आये तो देखा रसगुल्ला अलमारी के पीछे से गायब हो गया। हमारी आँखों में जो आशा का अथाह समुन्दर अपनी लहरों से हमारी प्यास बुझा रहा था वो समुन्दर सूख गया। समुन्दर तो सूखा ही सूखा हमारा रसगुल्ला भी सूख गया। हम दोनों सूखे मुँह बनाये वहां से चले गए। लेकिन हमारी उस चूहे से दुश्मनी हो गयी जिसने हमारा रसगुल्ला ले लिया। आज भी हमें उस रसगुल्ले का दुःख होता है।
ना अब हम आमा के बक्से से मिठाई चुरा पातें हैं। न हमारे पास उस चूहे से लड़ने की शक्ति है। वो दिन उस वक्त ख़तम हो गए थे जब हमारी आमा स्वर्गवासी हो गयी। आज नौ वर्ष बाद भी आमा की याद आती है। बहुत याद आती है उन दिनों की, उस बक्से की।
दूसरा कारनामा-
दूसरा कारनामा उन दिनों का है जब मैं माव (प्लेन्स) में रहता था और दाजू गर्षलेक ( गरसाडी से तीन किमी दूर एक स्थान जहा से गरसाडी को रास्ता जाता है वह भी हमारा एक मकान है ) में। गर्मी की छुट्टियों में हम पहाड़ चले गए। मम्मी ने मुझे दाजू के साथ एक महीना स्कूल जाने के लिए गर्षलेक में ही रोक दिया। मैं एक महीने के लिए स्कूल जाने के लिए दाजू की ड्रेस पहन के जाया करता था।
हमारे दिन ऐसे ही मौज मस्ती में बीतते। बड़े चाचा मुझे और दाजू को अपने स्कूटर में पाटी
( एक
क़स्बा जो गर्षलेक से पांच किमी दूर है ) में स्कूल छोड़ दिया करते । शाम को हम अपने साथ वाले बड़े बच्चों के साथ पैदल आ जाया करते।
एक दिन की बात है। स्कूल में एक बच्चे का रुमाल चोरी हो गया। अध्यापकों ने सभी की तलासी शुरू की लेकिन रुमाल कहाँ मिले, चोर शातिर था। मेरे पास भी तलासी के लिए आये, मुझे छोड़ दिया। मेरे पास अपना रुमाल था नहीं दूसरे का क्या होगा। चोर नहीं पकड़ा गया।
छुट्टी हुई सभी बच्चे घर गए। हम भी घर पहुंचे। दाजू ने बड़े उत्साह से जेब से रुमाल निकाला और मुझे दे दिया। कहने लगा तेरे पास रुमाल नहीं था तो तेरे लिए रुमाल आज हो गया। उसने रुमाल की चोरी मेरे लिए की थी। जहाँ उसकी चोरी से मेरा ह्रदय पत्थर का बन जाना था, उस चोरी ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। मेरे मन की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था, मुझे उसकी चोरी में अपने लिए उसका अनंत प्रेम दिखा, उसने ये चोरी मेरे लिए की थी। मुझे आज भी ये बात याद आती है तो मैं उस चोरी के लिए दाजू को उत्तरदायी नहीं ठहरा पाता हूँ। मुझे इतना याद नहीं लेकिन शायद हमने फिर उस लड़के का रुमाल उसे वापस कर दिया था।
छुट्टी हुई सभी बच्चे घर गए। हम भी घर पहुंचे। दाजू ने बड़े उत्साह से जेब से रुमाल निकाला और मुझे दे दिया। कहने लगा तेरे पास रुमाल नहीं था तो तेरे लिए रुमाल आज हो गया। उसने रुमाल की चोरी मेरे लिए की थी। जहाँ उसकी चोरी से मेरा ह्रदय पत्थर का बन जाना था, उस चोरी ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। मेरे मन की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था, मुझे उसकी चोरी में अपने लिए उसका अनंत प्रेम दिखा, उसने ये चोरी मेरे लिए की थी। मुझे आज भी ये बात याद आती है तो मैं उस चोरी के लिए दाजू को उत्तरदायी नहीं ठहरा पाता हूँ। मुझे इतना याद नहीं लेकिन शायद हमने फिर उस लड़के का रुमाल उसे वापस कर दिया था।
ये थी दाजू और मेरी कहानी के कुछ छोटे से पल। ये तो हमारे प्रेम की एक बून्द है, अभी तो पूरा समुन्दर बचा है। कुछ चीज़े राज़ ही अच्छी लगती हैं, उन्हें राज़ ही रहने देना चाहिए। आज भी दाजू और मैं वैसे ही हैं, जैसे पहले थे और हमेशा रहेंगे।


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