उसे भूखा मत सोने दो भाई - self-made 4 U


 use bhookha mt sone do bhai  

आज हमारी दुनिया  बहुत आगे पहुँच चुकी  है। अपने  जीवन को सुधारने और उसको दुसरो से अधिक  बेहतर बनाने के इस जिज्ञासु मनुष्य की जिज्ञासाएँ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है ।लोग धीरे-धीरे स्वार्थी स्वभाव के होते जा रहे है, इनकी एक ही विचारधारा ' मैं और मेरी दुनिया ' है। ये स्वार्थ धीरे-धीरे इन मनुष्यों को खा लेगा  और शायद  अंत समय में इन्हे अकेला जीवन व्यापन करना पड़े। स्वार्थ सबमें कूट-कूट कर भरा है और बढ़ता जा रहा है। जैसा स्वार्थ बन्दर में होता है उसी प्रकार।


मैं ललित बिष्ट अपनी कहानी के माध्यम से कहना चाहता हूँ---


एक सज्जन थे  जो इतने गरीब थे कि एक बार उनके घर में भूख से लाले पड़ गए  उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था।  वो  पिछले कुछ दिनों से  भोजन के लिए दर-दर भटक रहे थे   लेकिन कोई भी उनकी सहायता के लिए आगे नहीं आता था उनके रिस्तेदार भाई-बंधू भी उन्हें देखना तक नहीं चाहते थे। उनका जीवन मानों निराश सा हो गया था क्योकि अब उनका परिवार  जिस रोटी के सहारे था वो रोटी देने वाला अभी बेरोजगार बैठा है उसके पास तो धन है नौकरी वो कैसे उनका पेट पालेगा। उनका परिवार धीरे-धीरे सिमट सा गया। एकाएक सभी यमराज के पास चले गए।  अब उनका क्या होगा वो अकेले में सोचते कि वो किस कारन  जीवित है उनके  परिवार  का विनास हो गया और वो अभी भी ये कलंक लेकर जीवित है   मानों वो धीरे-धीरे उस  गुफा कि और निरंतर बढ़ते जा रहे हो जहाँ अँधेरा ही अँधेरा है और बढ़ता जा रहा है। उनका पूरा परिवार ख़त्म हो गया वो उस काली कोठरी में अकेले जी रहे थे।

एक बार किसी ने उन्हें कुछ काम के बदले दो रोटी और थोड़ा सा चावल दे दिया। उनकी उस गुफा में  किसी जगह से थोड़ी सी रोशनी गयी  हो अब वो आराम से बैठ उसे खाने लगे कि वहां एक व्यक्ति गया जिसके मुखमण्डल में ऐसा अंधकार छाया हुआ था और उसका तेज़ जैसे अमावस के दिन चाँद लुप्त हो जाता है उसी प्रकार लुप्त हो गया हो। उन्हें उसको देख के दया गयी , उन्होंने अपनी थाली उसे दे दी।किसी ने उनसे पूछा कि आप स्वयं भूखे  थे तो आपने अपना  भोजन  किसी और को किस कारन दिया -उत्तर आया- भोजन ही था साहब उसकी बेचारे कि भूख से ज्यादा थोड़ी था।अगर ऐसी ही सोच उनके रिश्तेदारों और मित्रों कि होती तो आज शायद उनका परिवार जीवित रहता।

तो दोस्तों मैं ललित बिष्ट आपसे ये अनुरोध करता हूँ कि कभी भी अपने स्वार्थ को बिना देखे किसी और कि मदद कर देना। और कुछ मदद भी हो तो उसे भूखा मत सोने देना।
                                                                                              
                                                                                                             

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