पर्यावरण शब्द परि+आवरण शब्दों से मिलकर बना है। ' परि ' का अर्थ है ' चारों ओर ' और आवरण का अर्थ है ' ढके हुए है ' अर्थात हमारे चारों ओर का वह परिवेश जिसमें समस्त जीवजंतु , वनस्पतियां आदि पाए जाते हैं, पर्यावरण कहलाता है।
पर्यावरण संरक्षण का महत्व
हमारे चारों ओर पाए जाने वाले सभी जीवों और वनस्पतियों का प्राकृतिक परिवेश से गहरा संबंध है। अर्थात वातावरण के प्रदूषित होने पर इन जीव जंतुओं और वनस्पतियों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। लगातार बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से सन 1992 में ब्राजील में विश्व के 174 देशों के मध्य ' पृथ्वी सम्मेलन ' आयोजित किया गया तथा पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देने के लिए अनेक उपाय सुझाए गए।
पर्यावरण संरक्षण की समस्या ( खेतों की पराली और अन्य कारण )
अनियंत्रित और अनियमित विकास की अंधी दौड़ ने भारत के अधिकांश बड़े शहरों को गैस का चैंबर बना दिया है। इन शहरों में वायु गुणवत्ता का स्तर इस सीमा तक खराब हो चुका है कि लोगों को सांस लेने में भी कठिनाई हो रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में प्रतिवर्ष वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है। विद्यालयों को बंद करना पड़ता है। सड़कों पर वाहनों की संख्या को कम करने के लिए " ऑड - इविन " नीति अपनाई जाती है, जिसमें सम दिनांक को सम पंजीकरण संख्या वाले वाहनों को तथा विषम दिनांक को विषम पंजीकरण संख्या वाले वाहनों को चलाने की अनुमति दी जाती है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकार, सर्वोच्च न्यायालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस क्षेत्र में बढ़ते वायु प्रदूषण का पूरा ठीकरा पंजाब, हरियाणा, पं. उत्तर प्रदेश के उन किसानों के सिर फोड़ते हैं जो हार्वेस्टर से कटाई किए गए धान की फसल के खेतों में खड़ी पराली को जला कर खेत को गेहूं की फसल के लिए तैयार करते हैं। मीडिया प्रशासन ओर राजनीतिज्ञ भी किसानों के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। किसी भी स्तर पर विवेकशील और वैज्ञानिक तरीके से इस तथ्य पर विचार नहीं किया जाता कि शहरों के बढ़ते वायु प्रदूषण एवं वातावरण में कार्बन की अधिकता के लिए क्या केवल ओर केवल पराली ही उत्तरदाई है ?
देश के जिन भागों में पराली नहीं जलाई जाती उन भागों में स्थित शहरों में वायु प्रदूषण और वातावरण में धुंध की अधिकता का कारण क्या है ?
विगत दशकों में कृषि विकास में तेजी लाने के क्रम में कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा दिया गया जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में डीजल चालित पंपों, ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया। आज से तीन दशक पूर्व तक धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि फसलों की कटाई हाथ से की जाती थी। धान का पुआल, गेहूं का भूसा, ज्वार - बाजरा का प्रयोग पशुओं के चारे के लिए किया जाता था। बढ़ते यंत्रीकरण से बैलों का पालना बंद हो गया। फसलों की कटाई मशीनों से की जाने लगी। किसान ने केवल मुख्य उपज धान, गेहूं, ज्वार, बाजरा, जौ, चना आदि को ही उठाया। पराली ( कृषि अवशिष्ट ) को खेतों में ही छोड़ा गया। खेत को अगली फसल के लिए तैयार करने के लिए पराली को जलाकर समाप्त करने की नीति अपनाई गई। कंबाइन हार्वेस्टर ने प्रणाली की समस्या को और अधिक गंभीर रूप प्रदान किया। कंबाइन हार्वेस्टर से फसल की कटाई किए जाने पर मशीन केवल बाली काटती है परंतु तना 1-2 फुट खेत में ही छूट जाता है उसे जलाकर नष्ट किया जाता है।
पराली को जलाकर खेत को मात्र दो-तीन दिन में ही खाली तो कर लिया जाता है लेकिन इसका खामियाजा अंततः किसानों को ही उठाना पड़ता है जिनका ज्ञान उन्हें नहीं है।
इसके कतिपय दोष निम्नलिखित हैं –
•पराली जलाने से उठने वाला धुआं वातावरण में फैलता है जिससे वातावरण में कार्बन कणों की परत बन जाती है जो सूर्य की किरणों को पृथ्वी पर पढ़ने के बाद परावर्तित होकर वापस नहीं जाने देती जिससे पृथ्वी के तापमान में वृद्धि (global warming) होती है।
•धुएं के कण पीएम 2.5 और पीएम 10 के रूप में वातावरण में बूंद के रूप में जमा होते हैं। सांस लेने के साथ यह फेफड़ों में जमा होते हैं तथा रक्त संचार में भी शामिल हो जाते हैं। अधिकाधिक लोग स्वास के लोगों से ग्रसित होने लगते हैं।
•वातावरण में धुंध जमा होने पर दृश्यता कम हो जाती है। सड़कों पर वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। वायु यातायात पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
•पराली जलाए जाने पर मिट्टी में मौजूद सभी लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु एवं केंचुए आदि जलकर भस्म हो जाते हैं जो अंततः मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कम करके कृषि की संपोषणीयता को प्रभावित करते हैं।
•पराली जलाए जाने से मिट्टी की ऊपरी सतह की घुलनशील क्षमता भी कम हो जाती है।
•SAFAR के एक आकलन के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के वातावरण में फैली धुंध और वायु प्रदूषण में पराली जलाए जाने का योगदान 40 प्रतिशत से 44 प्रतिशत तक है।
समाधान हेतु उठाए गए कदम
सर्वोच्च न्यायालय को ना केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की सरकार को वरन पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश की सरकारों को प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कड़े से कड़े उपाय अपनाने के निर्देश देने पड़े।
इस दिशा में उठाए गए कदमों का विवरण निम्न प्रकार है-
• भारत सरकार के उर्जा मंत्रालय ने 15 नवंबर, 2018 को यह निर्णय लिया कि पंजाब एवं हरियाणा के तापीय विद्युत संयंत्रों में न्यूनतम 5% तथा अधिकतम 10% तक बायोमास प्लेट्स को कोयला के साथ मिलाकर ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जाए।
• 2018-19 के बजट में फसलों की अवशिष्टों के स्वच्छ संग्रहण एवं निस्तारण हेतु सब्सिडाइजड मशीनें कृषकों को उपलब्ध कराने के लिए "Promotion Of Agricultural Mechanisation For In-Situ Management of Crop Residue In The State of Punjab, Haryana, Uttar Pradesh and NTC Of Delhi" नामक एक केंद्र प्रायोजित योजना 2018-19 एवं 2019-20 के लिए क्रमशः ₹ 591.65 करोड़ तथा ₹ 560.15 करोड़ प्रावधान के साथ लागू की गई।
• 2014 में केंद्र सरकार द्वारा जारी फसल अवशिष्ट प्रबंधन हेतु राष्ट्रीय नीति के तहत किसानों को ऐसी मशीनें प्रयुक्त करने के लिए प्रेरित किया गया जो फसलों की कटाई के बाद खेतों में पराली नहीं छोड़ती तथा फसल अवशिष्टों के पर्यावरण मित्रवत निस्तारण में सहायक होती हैं ऐसी मशीनें निम्नलिखित हैं -
1- हैपी सीडर– खेतों में खड़ी पराली में ही नई फसल की बुवाई करने वाली।
2- रोटावेटर– खेतों की अगली फसल हेतु तैयार करना तथा फसल अपशिष्ट के छोटे-छोटे टुकड़े करके उसे मिट्टी में मिलाना।
3- ज़ीरोटिल सीड ड्रिल– खेतों की जुताई किए बिना ही पूर्व की फसल की पराली के बीच ही बीजों की बुवाई।
4- बेलर– पराली/भूसे को एकत्रित करके उसकी गांठे बनाने वाली।
5- पैडी स्ट्रॉ बनाना चोपर– पुआल/पराली को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी में आसानी से मिलने लायक बनाने वाली

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