वन क्यों आवश्यक हैं - क्या है ये भारतीय वन अधिनियम- Self-made 4 U



 वन क्यों आवश्यक हैं 

जब हम नहीं थे, तब भी वन थे और जब हम नहीं होंगे तब भी वन होंगे ये तो निश्चित है , लेकिन क्या हम अपने मानव जाति के इस समय अंतराल में वनों को सुरक्षित रख पाएंगे ?  ये एक बड़ा प्रश्न है, जो मेरे को सोचने पर मजबूर कर देता है। हमारे देश में बहुत से राज्य ऐसे हैं, जहाँ अभी भी वन भरपूर मात्रा में हैं। चाहे वह उत्तराखंड हो या मध्य प्रदेश लेकिन ये बात हमें कांटे की तरह चुभनी चाहिए की ये वन कब तक रहेंगे ? क्या ये बात किसी को अच्छी लगेगी की अगर हमारे विश्व से वन प्रतिशत धीरे धीरे घटता गया तो मानव जाति से लेकर सम्पूर्ण जाति जीवन संकट में जाएगा।


ये बात तब हैरान कर देती है, कि जब हमें पता है, कि अगर वन नहीं रहेंगे तो हम नहीं रहेंगे।  हम फिर भी अपने निजी उपभोग के लिए वनों को तो नष्ट कर ही रहें हैं वरन हम सम्पूर्ण प्रजातियों के अंत का कारण भी बन रहे हैं।


वन्य क्षेत्र के निकट रहने वाले लोगो का जीवन पूर्ण रूप से वन पर ही निर्भर रहता है। ये लोग वनो से ही अपने भोजन के लिए लकड़ियां लाते हैं और अपने पशुओं के लिए चारे - पानी की व्यवस्था भी वनों से ही करते हैं।


वन केवल उन  लोगो के जीवन से ही नहीं बल्कि हमारे जीवन में भी बहुत अच्छा प्रभाव डालते हैं हमारे दैनिक  जीवन की पूर्ति के साथ- साथ वन हमें शुद्ध प्राणवायु oxygen भी प्रदान करते हैं। वन के कारण ही हमारी जलवायु शुद्ध होने के साथ - साथ हमारी प्रकृति हमारे लिए एक अनुपम छाप छोड़ती है।


अगर हमारे आस- पास कोई वन है तो वो हमारे जीवन को मधुर और सुखमय बनाते हैं। अतः वन्य जीव और वन हमारे लिए एक बहुमूल्य सम्पदा हैं।

                   
 क्या है ये भारतीय वन अधिनियम-
 भारतीय वन अधिनियम - 1927


वनों की सुरक्षा के लिए आजादी से पहले ही कानूनों का निर्माण कर दिया गया था। वनों के उपज के अभिवहन और इमरती लकड़ी और वन्य उपज उद्घरण के शुल्क में सम्बद्ध सभी मामलों की व्यवस्था इस अधिनियम में की गई है। इसके अंतर्गत कोई भी राज्य सरकार किसी वन भूमि या बंज़र भूमि या अन्य भूमि जो सरकार की संपत्ति है, अधिनियम की धारा - 3 के अंतर्गत प्राविधानित ढंग से संरक्षित वन नियत कर सकती है


1 - इस अधिनियम के अंतर्गत जो वन अधिकारी होगा उसे आरक्षित वनों के रास्ते बंद कराने की पूरी छूट
      होगी


2 - यदि कोई भी व्यक्ति वन या वन्य प्राणी को किसी प्रकार की क्षति ( पेड़ गिराना, आग लगाना, वन्य जीव            को मारना, आदि ) पंहुचता है तो उसे दण्डित किया जायेगा। 


3 - यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार वन में जान बूझकर आग लगाए या नुकसान पहुचाये तो राज्य सरकार उस           व्यक्ति के चरागाह या वन उपज के सभी अधिकारों को जितनी उसे उचित लगे समयावधि के लिए निलंबित          सकती है।


4 - राज्य सरकार अपनी भूमि ( किसी भी प्रकार की ) जो उसकी संपत्ति है उसे धारा - 3 संरक्षित वन नियत                करेगी।


5-  यदि वन अधिकारी इस अधिकार को नामंजूर कर देता है , तो इस आदेश के विरुद्ध में 5 महीने के अंदर              न्यायलय में अपील दर्ज की जा सकती है।

                       
 क्या हैं इसके मुख्य बिंदु -

 वनो को नुकसान पहुँचाने वाले को दंड-


धारा - 30  के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति वन में वृक्ष कटेगा , छांटेगा या छेदेगा और जलाएगा या तोड़ेगा तो उसे दंड दिया जाएगा। अगर व्यक्ति वन में आग लगाकर वन को जलता छोड़ देगा तो उसे 6 महीने तक या 500 रूपए जुर्माना भरना होगा।


बिना वारंट गिरफ्तार हो सकता है -

कोई भी व्यक्ति  यदि वन अपराधी है तो धारा- 68 के अंतर्गत पुलिस अधिकारी या वन अधिकारी उसे बिना मजिस्ट्रेट के आदेशों के गिरफ्तार कर सकेगा।


वनों के प्रबंध ग्रहण करने की शक्ति-

यदि राज्य सरकार लोकहित में किसी विशिष्ट वन भूमि का प्रबंधन लेना चाहती है तो वह अधिनियम की धारा- 38  के अंतर्गत शक्ति का प्रयोग करके राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसा आदेश पारित कर सकती है।


पशु अतिचार अधिनियम 1871 -

यदि कोई पशु वन में अतिचार करता है तो धारा - 11 के अंतर्गत उस पशु को लोक बागान को नष्ट करने के अपराध में किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अभिग्रहित और परिबद्ध किया जा सकेगा।

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